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बड़ी खबर/न्यूज़/wood mafia wreaks havoc on greenery mango orchards being destroyed in fruit belt areas

हरियाली पर 'लकड़ी माफिया' का कहर: फल पट्टी क्षेत्रों में उजड़ रहे आम के बाग

लखनऊ अपनी नवाबी संस्कृति और 'दशहरी' आम के स्वाद के लिए दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन शुक्रवार को एक गंभीर पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़ी है। शहर के बाहरी इलाकों—पारा, दुबग्गा और काकोरी—में लकड़ी माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि रातों-रात दर्जनों हरे-भरे फलदार पेड़ों को जमींदोज किया जा रहा है।

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7:12 PM, May 8, 2026

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 हरियाली पर 'लकड़ी माफिया' का कहर: फल पट्टी क्षेत्रों में उजड़ रहे आम के बाग
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हरियाली पर 'लकड़ी माफिया' का कहर संकेतिक फोटो सौ0 bma7.in

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लखनऊ अपनी नवाबी संस्कृति और 'दशहरी' आम के स्वाद के लिए दुनिया भर में मशहूर है, लेकिन शुक्रवार को एक गंभीर पर्यावरणीय संकट के मुहाने पर खड़ी है। शहर के बाहरी इलाकों—पारा, दुबग्गा और काकोरी—में लकड़ी माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि रातों-रात दर्जनों हरे-भरे फलदार पेड़ों को जमींदोज किया जा रहा है। विडंबना यह है कि यह सब उन 'जिम्मेदारों' की नाक के नीचे हो रहा है, जिनके कंधों पर पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी है।

स्थानीय ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि, अवैध कटान का यह खेल योजनाबद्ध तरीके से रात के सन्नाटे में खेला जाता है। माफियाओं की नजर विशेष रूप से उन आम के बागों पर है जो पुराने हैं और जिनकी लकड़ियों की बाजार में भारी मांग है। काकोरी के प्यारेपुर, अजमत नगर और मौदा जैसे गांवों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं कि, बिना किसी अनुमति के 15-20 साल पुराने फलदार पेड़ों को काट दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि, जब वे सुबह उठते हैं, तो उन्हें पेड़ों की जगह सिर्फ कटे हुए ठूँठ मिलते हैं।

इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप वन विभाग के क्षेत्रीय कर्मियों पर लग रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, लकड़ी माफिया और विभाग के कुछ भ्रष्ट कर्मचारियों के बीच गहरा तालमेल है। जब भी किसी अवैध कटान की सूचना दी जाती है, तो कार्रवाई के नाम पर केवल 'खानापूर्ति' की जाती है। विभाग मामूली जुर्माना लगाकर या लकड़ी के चंद बोटे जब्त कर अपना पल्ला झाड़ लेता है। सख्त कानूनी कार्रवाई और एफआईआर के अभाव में माफियाओं के मन से कानून का डर पूरी तरह खत्म हो चुका है।

प्रशासनिक स्तर पर एक बड़ी खामी संसाधनों की कमी भी है। लखनऊ जिले के आठ ब्लॉकों में अवैध कटान और शिकार रोकने की जिम्मेदारी जिस उड़न दस्ते पर है, उसके पास पूरे जिले के लिए मात्र एक गाड़ी उपलब्ध है। ऐसे में माफियाओं के लिए एक स्थान पर कटान कर दूसरे स्थान पर भाग जाना बेहद आसान हो गया है। संसाधनों के अभाव में विभाग का खुफिया तंत्र और गश्ती दल पूरी तरह बेअसर नजर आता है।

उत्तर प्रदेश में आम, नीम और शीशम जैसी 29 प्रजातियों के पेड़ों को काटने पर सख्त प्रतिबंध है। उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम 1976 के तहत किसी भी प्रतिबंधित पेड़ को काटने से पहले वन विभाग से ऑनलाइन अनुमति लेना अनिवार्य है। नियमों के अनुसार, एक पेड़ काटने के बदले 10 नए पौधे लगाना और उनकी देखभाल करना जरूरी है।हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी यूपी सरकार को फटकार लगाते हुए आम के पेड़ों की जियो-टैगिंग करने और अवैध कटान पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में टिप्पणी की थी कि, बड़ी संख्या में पेड़ों को काटना इंसानों की हत्या से भी बदतर है।

काकोरी क्षेत्र को 'फल पट्टी' घोषित किया गया है ताकि आम के उत्पादन को बढ़ावा मिले। लेकिन आज इसी क्षेत्र में अवैध प्लॉटिंग और निर्माण कार्यों के चलते बागों का सफाया हो रहा है। किसानों का कहना है कि वे सालों तक पेड़ों को पालते हैं, लेकिन माफिया और भू-माफिया की नजर उनके बागों को उजाड़ने पर है। इससे न केवल उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है, बल्कि भविष्य में लखनऊ की प्रसिद्ध 'मलिहाबादी' और 'दशहरी' किस्मों का अस्तित्व भी खतरे में है।

मुस्कान सिंह

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मुस्कान सिंह

रिपोर्टर

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