"लखनऊ में 'जीरो टॉलरेंस' को ठेंगा: दौली खेड़ा में रात भर गूँजती जेसीबी की आवाजें
लखनऊ के बाहरी इलाकों में खनन माफिया कानून और व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए कुदरत के सीने पर जख्म दे रहे हैं। काकोरी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली घुरघुरी तालाब पुलिस चौकी की सीमा में स्थित दौली खेड़ा गांव इन दिनों अवैध खनन का नया गढ़ बन चुका है। यहाँ रात के अंधेरे में जो खेल चल रहा है, वह न केवल सरकारी राजस्व को करोड़ों का चूना लगा रहा है, बल्कि स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्
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7:51 PM, Apr 26, 2026
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घुरघुरी तालाब पुलिस चौकी के पास बेखौफ दौड़ रहे खनन के ट्रैक्टर सौ0 bma7.in
बख्शी का तालाब । लखनऊ के बाहरी इलाकों में खनन माफिया कानून और व्यवस्था को ठेंगा दिखाते हुए कुदरत के सीने पर जख्म दे रहे हैं। काकोरी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली घुरघुरी तालाब पुलिस चौकी की सीमा में स्थित दौली खेड़ा गांव इन दिनों अवैध खनन का नया गढ़ बन चुका है। यहाँ रात के अंधेरे में जो खेल चल रहा है, वह न केवल सरकारी राजस्व को करोड़ों का चूना लगा रहा है, बल्कि स्थानीय पुलिस की कार्यशैली पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है।
दौली खेड़ा क्षेत्र में सूरज ढलते ही एक अलग दुनिया आबाद हो जाती है। जब आम नागरिक चैन की नींद सोने की तैयारी कर रहे होते हैं, तब यहाँ खनन माफियाओं की जेसीबी मशीनें और दर्जनों ट्रैक्टर-ट्रॉली सक्रिय हो जाते हैं। स्थानीय सूत्रों और चश्मदीदों के अनुसार, बीती रात यहाँ अवैध खनन का वीभत्स रूप देखने को मिला। पूरी रात सन्नाटे को चीरती हुई छोटी जेसीबी मशीनों की आवाजें गूँजती रहीं। ताज्जुब की बात यह है कि, घुरघुरी तालाब पुलिस चौकी से चंद दूरी पर होने के बावजूद इन मशीनों की गड़गड़ाहट खाकी तक नहीं पहुँची, या शायद पहुँच कर भी अनसुनी कर दी गई।दर्जनों की संख्या में मिट्टी लदे ट्रैक्टर पूरी रात मुख्य सड़कों पर सरपट दौड़ते रहे। बिना किसी ढकन या सुरक्षा मानकों के, ये ट्रैक्टर न केवल धूल का गुबार उड़ा रहे थे, बल्कि तेज़ रफ्तार के कारण स्थानीय ग्रामीणों की जान के लिए भी खतरा बने हुए थे। माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें न तो रात में गश्त करने वाली पुलिस का डर है और न ही प्रशासन की कार्रवाई का खौफ।
राजस्व को करोड़ों की चपत, पर्यावरण पर प्रहार
मिट्टी का यह अवैध उठान केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राजकीय कोष पर हमला है। नियमानुसार, मिट्टी के खनन के लिए रॉयल्टी जमा करनी होती है और संबंधित विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है। लेकिन दौली खेड़ा में बिना किसी परमिट के रात के अंधेरे में खुदाई की जा रही है। जानकारों का मानना है कि इस खेल में बड़े पैमाने पर धन का लेनदेन होता है, जिसकी वजह से माफिया बेखौफ होकर सरकारी संपत्ति की चोरी कर रहे हैं।
इसके साथ ही, अनियंत्रित गहराई तक मिट्टी खोदने से जमीन का जलस्तर प्रभावित हो रहा है और भविष्य में कृषि भूमि के बंजर होने का खतरा बढ़ गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के स्पष्ट आदेश हैं कि, रात के समय और बिना पर्यावरणीय मंजूरी के खनन नहीं किया जा सकता, लेकिन काकोरी के इस इलाके में इन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।
स्थानीय ग्रामीणों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है। नाम न छापने की शर्त पर ग्रामीणों ने बताया कि, "जब भी पुलिस को फोन किया जाता है, तो या तो फोन नहीं उठता या फिर पुलिस के पहुँचने से पहले ही माफियाओं को खबर लग जाती है और काम बंद हो जाता है।" यह स्थिति स्पष्ट करती है कि विभाग के अंदर ही कुछ 'विभीषण' बैठे हैं जो चांदी के सिक्कों की खनक के आगे अपनी वर्दी का फर्ज भूल चुके हैं।घुरघुरी तालाब पुलिस चौकी की नाक के नीचे इतना बड़ा ऑपरेशन चलना बिना मिलीभगत के संभव नहीं दिखता। सवाल यह है कि, आखिर किसके संरक्षण में ये खनन माफिया फल-फूल रहे हैं? क्या उच्च अधिकारी इस संगठित अपराध से अनभिज्ञ हैं या फिर वे भी किसी दबाव के कारण कार्रवाई करने से बच रहे हैं?
स्थानीय जनजीवन और शांति भंग
अवैध खनन के कारण दौली खेड़ा और आसपास के गांवों की सड़कें जर्जर हो रही हैं। भारी वाहनों की आवाजाही ने रास्तों को गड्ढों में तब्दील कर दिया है। रात भर होने वाले शोर-शराबे से बुजुर्गों और बच्चों की नींद हराम हो गई है। सड़कों पर उड़ने वाली मिट्टी से सांस की बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द ही इस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो वे आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे।

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मुस्कान सिंह
रिपोर्टर