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मनोरंजन/न्यूज़/when phagun used to enter the hearts holi of memories

जब फागुन दिलों में उतरता था: यादों की होली

आज जब होली की पहचान तेज़ संगीत, मोबाइल कैमरों और बाजारू रंगों से होती है, तब एक पीढ़ी ऐसी भी है जिसकी आंखें फागुन आते ही आज भी पुराने दिनों की होली खोजने लगती हैं। वह होली, जो शरीर पर नहीं—सीधे दिलों पर खेली जाती थी।गांव की कच्ची गलियों में फागुन लगते ही जैसे समय थम जाता था। हर शाम चौपाल पर ढोलक की थाप गूंजती, फगुआ की तान उठती और पूरा गांव एक सुर में गा उठता। कोई मंच नहीं, कोई माइक नहीं—बस अपनापन

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11:51 PM, Feb 9, 2026

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जब फागुन दिलों में उतरता था: यादों की होली
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होली के पर्व पर रंग खेलते लोग फोटो सौ -इंटरनेट

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उत्तर प्रदेश।लखनऊ।आज जब होली की पहचान तेज़ संगीत, मोबाइल कैमरों और बाजारू रंगों से होती है, तब एक पीढ़ी ऐसी भी है जिसकी आंखें फागुन आते ही आज भी पुराने दिनों की होली खोजने लगती हैं। वह होली, जो शरीर पर नहीं—सीधे दिलों पर खेली जाती थी।गांव की कच्ची गलियों में फागुन लगते ही जैसे समय थम जाता था। हर शाम चौपाल पर ढोलक की थाप गूंजती, फगुआ की तान उठती और पूरा गांव एक सुर में गा उठता। कोई मंच नहीं, कोई माइक नहीं—बस अपनापन और खुला दिल। 82 वर्षीय रामऔतार शुक्ला की आंखें नम हो जाती हैं। धीमी आवाज़ में कहते हैं,“पहले होली आती नहीं थी, महसूस होती थी। रंगों से पहले मन रंग जाता था।”

रंगों से पहले रिश्ते घुलते थे

उस दौर की होली में रंग खरीदने नहीं पड़ते थे। टेसू के फूल उबालकर रंग बनते, महिलाएं आंगन में बैठकर गुझिया और पुए तलतीं। खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती और कोई भूखा नहीं रहता। दरवाज़े बंद नहीं होते थे, दिल भी नहीं।80 वर्षीय श्यामा देवी की हथेलियां अब कांपती हैं, मगर यादें आज भी मजबूत हैं।“किसी के घर जाना हो तो न्योता नहीं लगता था। जो रास्ते से निकला, वही अपना था।”

होलिका दहन: सिर्फ आग नहीं, संस्कार

पुराने समय में होलिका दहन की रात बच्चों को पास बैठाकर बुजुर्ग प्रह्लाद की कथा सुनाते थे। यह सिर्फ कहानी नहीं, जीवन का पाठ होता था—कि अहंकार कितना भी बड़ा हो, सच के आगे जल ही जाता है।आज दहन होता है, मगर वह संवाद कहीं खो गया है।

जब दुश्मन भी गले लग जाता था

पुरानी होली की सबसे बड़ी खूबी थी—मन का बोझ उतर जाना। बरसों की नाराज़गी एक आलिंगन में घुल जाती थी। होली में गले मिलना सिर्फ परंपरा नहीं, माफी और स्वीकार का प्रतीक था।पूर्व शिक्षक शिवकुमार मिश्र कहते हैं,“अब रंग ज्यादा हैं, मगर मिलन कम है। पहले एक रंग काफी था—अपनापन।”

सिर्फ यादों में बची होली

समय बदल गया, पीढ़ियाँ आगे बढ़ गईं, मगर बुजुर्गों के मन में वह होली आज भी जिंदा है—जैसे किसी पुराने गीत की धुन। वे मानते हैं कि अगर नई पीढ़ी थोड़ी-सी उस सादगी को अपना ले, तो फागुन फिर से दिलों में उतर सकता है।क्योंकि वह होली,जो दिल से खेली जाती थी,आज भी सबसे गहरे रंग छोड़ गई है।

राज प्रताप सिंह

लेखक के बारे में

राज प्रताप सिंह

वरिष्ठ संवाददाता

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