“पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है हत्या हुई,लेकिन एक साल बाद भी खुलासे पर पुलिस की खामोशी क्यों?
राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब थाना क्षेत्र के भौली गांव में इंटरमीडिएट के छात्र पीयूष उर्फ मानू रावत (20) की नृशंस हत्या को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन पुलिस आज तक न तो हत्यारों तक पहुंच सकी और न ही इस जघन्य हत्याकांड का खुलासा कर पाई है। यह मामला अब अपराध से ज्यादा पुलिस की विफलता और लचर जांच का प्रतीक बन चुका है।पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हो चुका है कि छात्र की गला कसकर हत्या की गई
lucknow
11:56 PM, Jan 19, 2026
Share:


मृतक पीयूष रावत उर्फ मानू फोटो सौ.bma 7
- - राज प्रताप सिंह वरिष्ठ पत्रकार
राजधानी लखनऊ के बख्शी का तालाब थाना क्षेत्र के भौली गांव में इंटरमीडिएट के छात्र पीयूष उर्फ मानू रावत (20) निवासी हाजीपुर की नृशंस हत्या को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन पुलिस आज तक न तो हत्यारों तक पहुंच सकी और न ही इस जघन्य हत्याकांड का खुलासा कर पाई है। यह मामला अब अपराध से ज्यादा पुलिस की विफलता और लचर जांच का प्रतीक बन चुका है।पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हो चुका है कि छात्र की गला कसकर हत्या की गई थी और शरीर पर कई जगह गंभीर चोटों के निशान थे। इसके बावजूद पुलिस की जांच आज भी वहीं की वहीं खड़ी है। शुरुआती दिनों में जिन “जल्द खुलासे” के दावे किए गए थे, वे वक्त के साथ खोखले साबित हुए।
11 दिसंबर को घर से निकले छात्र की गुमशुदगी, फिर निर्माणाधीन मकान में मिला शव, पोस्टमार्टम में हत्या की पुष्टि—हर कड़ी पुलिस के सामने थी। इसके बावजूद न तो कोई ठोस गिरफ्तारी हुई, न चार्जशीट दाखिल हुई और न ही पीड़ित परिवार को न्याय की कोई उम्मीद दिखी।हत्या के बाद पुलिस ने छात्र के दोस्तों से पूछताछ, मोबाइल की सीडीआर खंगालने और कई टीमों के गठन की बातें कहीं थीं, लेकिन ये सारी कवायद कागजों तक ही सीमित रह गई। परिजनों का आरोप है कि कुछ समय बाद पुलिस ने मामले में दिलचस्पी लेना ही छोड़ दिया।
पीयूष के पिता का कहना है कि उन्होंने थाने से लेकर उच्चाधिकारियों तक गुहार लगाई, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। ग्रामीणों का गुस्सा भी अब फूटने लगा है। उनका कहना है कि अगर एक पढ़ने वाले छात्र की हत्या का खुलासा एक साल में नहीं हो सकता, तो आम आदमी की सुरक्षा का क्या भरोसा?
अब सवाल सीधे और तीखे हैं—
• क्या बीकेटी पुलिस इस हत्याकांड को सुलझाने में पूरी तरह नाकाम हो चुकी है?
• क्या शुरुआती जांच में हुई लापरवाही ने हत्यारों को बच निकलने का मौका दिया?
• क्या पीयूष के परिवार को कभी न्याय मिलेगा, या यह केस भी फाइलों में दफन हो जाएगा?
• ग्रामीणों और परिजनों ने अब शासन से मांग की है कि मामले की जांच बीकेटी पुलिस से हटाकर एसआईटी या सीबीसीआईडी को सौंपी जाए, विवेचक बदला जाए और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए। उनका कहना है कि जब तक सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ऐसे हत्याकांड यूं ही अनसुलझे रहते रहेंगे।
पुलिस की चूक : एक साल की नाकामी की टाइमलाइन
11 दिसंबर 2024
▶ इंटरमीडिएट छात्र पीयूष उर्फ मानू रावत घर से बाइक पर निकला, वापस नहीं लौटा।
▶ परिवार ने उसी दिन खोजबीन शुरू की, पुलिस को मौखिक सूचना दी।
12 दिसंबर 2024
▶ बीकेटी थाने में गुमशुदगी दर्ज।
▶ परिजनों का आरोप: शुरुआती 24 घंटे बेहद अहम थे, लेकिन सक्रिय तलाशी नहीं हुई।
14–15 दिसंबर 2024
▶ भौली गांव के निर्माणाधीन मकान में छात्र का शव बरामद।
▶ घटनास्थल से पर्याप्त साक्ष्य सुरक्षित नहीं किए गए, फोरेंसिक टीम देर से पहुंची।
16 दिसंबर 2024
▶ पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला कसकर हत्या और शरीर पर चोटों की पुष्टि।
▶ इसके बावजूद हत्या के एंगल पर जांच में तेजी नहीं आई।
दिसंबर 2024 – जनवरी 2025
▶ कुछ दोस्तों को पूछताछ के लिए उठाया गया, लेकिन ठोस पूछताछ व कार्रवाई नहीं।
▶ मोबाइल सीडीआर “खंगालने” की बात कही गई, पर कोई निष्कर्ष सामने नहीं आया।
फरवरी 2025 – जून 2025
▶ केस में कोई बड़ी प्रगति नहीं।
▶ न गिरफ्तारी, न चार्जशीट, न सार्वजनिक अपडेट।
जुलाई 2025 – दिसंबर 2025
▶ जांच ठंडे बस्ते में जाती दिखी।
▶ परिजन और ग्रामीण थाने व अधिकारियों के चक्कर लगाते रहे।
जनवरी 2026 (एक वर्ष पूर्ण)
▶ हत्या के एक साल बाद भी मामला अनसुलझा।
▶ न हत्यारे पकड़े गए, न पुलिस ने अपनी नाकामी की जिम्मेदारी ली।
बड़ा सवाल
- जब पोस्टमार्टम से हत्या साबित हो चुकी थी, तो पुलिस की जांच क्यों ठहर गई?
- क्या शुरुआती लापरवाही ने हत्यारों को बच निकलने का मौका दे दिया?
सीएम से सीधे सवाल
▶ मुख्यमंत्री से सवाल
• क्या एक छात्र की हत्या का अनसुलझा रहना प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं है?
• क्या पीयूष हत्याकांड की जांच बीकेटी पुलिस से हटाकर SIT/CB-CID को सौंपी जाएगी?
• क्या लापरवाह पुलिस अधिकारियों पर जवाबदेही तय होगी या मामला यूं ही दब जाएगा?
▶ डीजीपी से सवाल
• हत्या के इतने स्पष्ट साक्ष्यों के बावजूद जांच किस स्तर पर फेल हुई?
• क्या शुरुआती जांच में हुई चूक की आंतरिक जांच कराई गई?
• एक साल में न गिरफ्तारी, न चार्जशीट—क्या यह पुलिस की गंभीर विफलता नहीं?
• क्या विवेचक बदलकर मामले की नई सिरे से जांच कराई जाएगी?
Note...
- “अगर एक पढ़े-लिखे छात्र के हत्यारों तक पुलिस नहीं पहुंच सकती, तो आम नागरिक की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?”

लेखक के बारे में
राज प्रताप सिंह
वरिष्ठ संवाददाता