लखनऊ में 'पंचतत्व' संस्था ने बड़े मंगल पर बांटे 25 हजार हरे पत्तल और 2000 अभिमंत्रित पौधे
लखनऊ में ज्येष्ठ मास के बड़े मंगल का पर्व बेहद खास और ऐतिहासिक होता है। इस पावन अवसर पर पूरी अवध नगरी भगवान हनुमान की भक्ति में सराबोर नजर आती है। शहर के कोने-कोने में विशाल भंडारों का आयोजन किया जाता है, जहां लाखों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। लेकिन अक्सर इन धार्मिक आयोजनों के बाद सड़कों पर बिखरा प्लास्टिक और थर्माकोल का कचरा पर्यावरण प्रेमियों को चिंतित करता रहा है।
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2:47 PM, May 19, 2026
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लखनऊ में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण की अनूठी मिसाल सौ0 bma7.in
लखनऊ में ज्येष्ठ मास के बड़े मंगल का पर्व बेहद खास और ऐतिहासिक होता है। इस पावन अवसर पर पूरी अवध नगरी भगवान हनुमान की भक्ति में सराबोर नजर आती है। शहर के कोने-कोने में विशाल भंडारों का आयोजन किया जाता है, जहां लाखों श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। लेकिन अक्सर इन धार्मिक आयोजनों के बाद सड़कों पर बिखरा प्लास्टिक और थर्माकोल का कचरा पर्यावरण प्रेमियों को चिंतित करता रहा है।इसी गंभीर समस्या का एक बड़ा और अनुकरणीय समाधान लेकर सामने आई है लखनऊ की सामाजिक और धार्मिक संस्था 'पंचतत्व' संस्था ने इस बार बड़े मंगल के अवसर पर न केवल धार्मिक आस्था का सम्मान किया, बल्कि समाज को पर्यावरण संरक्षण का एक बहुत बड़ा और प्रभावी संदेश भी दिया। संस्था की ओर से लखनऊ महानगर के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होने वाले भंडारों में लगभग 25 हजार से अधिक प्राकृतिक हरे पत्तलों और करीब 2000 औषधीय व छायादार पौधों का मुफ्त वितरण किया गया।
लखनऊ में बड़े मंगल के दिन हजारों छोटे-बड़े भंडारे लगाए जाते हैं। इन भंडारों में पूरी-सब्जी, बूंदी, छोला-चावल और शरबत का प्रसाद बड़े पैमाने पर वितरित किया जाता है। अमूमन इन आयोजनों में थर्माकोल की थालियों, प्लास्टिक के गिलासों और चम्मचों का धड़ल्ले से उपयोग होता है। यह प्लास्टिक और थर्माकोल नॉन-बायोडिग्रेडेबल होने के कारण पर्यावरण, नालियों और बेजुबान पशुओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक साबित होता है। शाम ढलते-ढलते शहर की सड़कें कचरे के ढेर में तब्दील हो जाती हैं।पंचतत्व संस्था की इस मुहिम का मुख्य उद्देश्य इन्हीं भंडारों को पूरी तरह से 'प्लास्टिक और थर्माकोल मुक्त' बनाना है। संस्था का मानना है कि स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा भी ईश्वर की सच्ची सेवा है। प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर की गई पूजा अधूरी है। इसी सोच के साथ संस्था ने इस विशेष जागरूकता सह वितरण अभियान की शुरुआत की है।
संस्था के मार्गदर्शक और मुख्य संयोजक अंकित पाठक ने इस अभियान की सफलता और समाज में आ रहे बदलावों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि शुरुआत के दिनों में स्थिति काफी अलग थी। संस्था के वालेंटियर्स और सदस्यों को खुद एक-एक भंडारा स्थल पर जाना पड़ता था, आयोजकों को ढूंढना पड़ता था और उन्हें थर्माकोल का उपयोग न करने के लिए समझाना पड़ता था। कई बार लोग पर्यावरण की बात को गंभीरता से नहीं लेते थे।लेकिन, अब समय तेजी से बदल रहा है। लखनऊ के नागरिकों और भंडारा आयोजकों में एक सकारात्मक और बड़ी पर्यावरणीय चेतना देखने को मिल रही है। अंकित पाठक ने बताया कि अब संस्था को जमीन पर जाकर ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस बार का अनुभव बेहद सुखद रहा क्योंकि शहर के जागरूक नागरिक और भंडारा प्रबंधक आयोजन से दो-तीन दिन पहले ही खुद पंचतत्व संस्था से संपर्क करने लगे थे। उन्होंने पहले ही अपनी आवश्यकता के अनुसार हरे पत्तलों और पौधों की बुकिंग करा ली थी। इस अग्रिम सूचना के कारण संस्था के लिए भी वितरण कार्य को बेहद व्यवस्थित, सुचारू और प्रभावी तरीके से संभालना आसान हो गया। यह बदलाव इस बात का साफ संकेत है कि समाज अब अपनी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारी को बखूबी समझने लगा है।
इस बार के अभियान में पंचतत्व संस्था ने एक बेहद अनूठा और सराहनीय प्रयोग किया, जिसने हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींचा। संस्था की ओर से बांटे गए करीब 2000 पौधे सामान्य पौधे नहीं थे, बल्कि उन्हें वैदिक रीति-रिवाज और पूर्ण श्रद्धा के साथ 'हनुमान चालीसा' से अभिमंत्रित किया गया था।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब किसी जीव या वनस्पति को मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित किया जाता है, तो उसके प्रति लोगों की श्रद्धा और देखभाल की भावना कई गुना बढ़ जाती है। संस्था का यह प्रयास धार्मिक आस्था को सीधे तौर पर प्रकृति से जोड़ने का एक सफल प्रयोग रहा। जिन श्रद्धालुओं और आयोजकों को ये अभिमंत्रित पौधे सौंपे गए, उन्होंने बेहद सम्मान के साथ इन्हें स्वीकार किया और यह संकल्प लिया कि वे इन पौधों को न केवल रोपित करेंगे, बल्कि एक संतान की तरह इनकी देखभाल भी करेंगे ताकि ये बड़े होकर विशाल वृक्ष बन सकें।
मंगलवार की भोर होते ही, जब पूरा शहर हनुमान मंदिरों की घंटियों और भजनों से गूंज रहा था, तभी से पंचतत्व संस्था के युवा वालेंटियर्स की अलग-अलग टीमें लखनऊ के विभिन्न चौराहों, रिहायशी इलाकों और मुख्य मार्गों पर सक्रिय हो गईं। हजरतगंज, गोमती नगर, आशियाना, भूतनाथ, चौक, और राजाजीपुरम जैसे बड़े और व्यस्त इलाकों में जहां-जहां विशाल भंडारे चल रहे थे, वहां संस्था की गाड़ियां पहुंचीं और ताजे, स्वच्छ हरे पत्तलों का बंडल आयोजकों को सौंपा गया। वालेंटियर्स ने न केवल सामग्री बांटी, बल्कि वहां मौजूद आम जनता और सेवादारों को प्लास्टिक से होने वाले कैंसर व अन्य गंभीर रोगों के प्रति भी जागरूक किया।
पंचतत्व संस्था का यह अभियान महज एक दिन का आयोजन नहीं है, बल्कि यह एक बड़े सामाजिक आंदोलन की नींव है। धार्मिक त्योहारों के उल्लास के बीच पर्यावरण की सेहत का ख्याल रखना कैसे संभव है, यह इस संस्था ने बखूबी करके दिखाया है। यदि देश के हर शहर और हर त्योहार में इस तरह के इको-फ्रेंडली मॉडल को अपनाया जाए, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ, सुंदर और सुरक्षित वातावरण सौंपने में कामयाब हो सकेंगे। लखनऊ के इस 'ग्रीन बड़े मंगल' की गूंज अब पूरे प्रदेश और देश में सुनाई दे रही है और यह अन्य सामाजिक संगठनों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

लेखक के बारे में
मुस्कान सिंह
रिपोर्टर