किरकिरी से गिरफ्तारी तक: ₹2,672 करोड़ के 'मास्टरमाइंड' की वतन वापसी
देश के बैंकिंग इतिहास में सबसे बड़े धोखाधड़ी मामलों में से एक,गणेश ज्वेलरी हाउस लिमिटेड घोटाले के मुख्य आरोपी कमलेश पारेख को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने संयुक्त अरब अमीरात से सफलतापूर्वक प्रत्यर्पित कर भारत वापस ले आया है। शुक्रवार को इंटरपोल और विदेश मंत्रालय के समन्वय से हुई इस कार्रवाई को भारत की आर्थिक अपराधियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।
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3:58 PM, May 2, 2026
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भारत लाया गया मास्टरमाइंड सौ0 bma7.in
नई दिल्ली। देश के बैंकिंग इतिहास में सबसे बड़े धोखाधड़ी मामलों में से एक,गणेश ज्वेलरी हाउस लिमिटेड घोटाले के मुख्य आरोपी कमलेश पारेख को केंद्रीय जांच ब्यूरो ने संयुक्त अरब अमीरात से सफलतापूर्वक प्रत्यर्पित कर भारत वापस ले आया है। शुक्रवार को इंटरपोल और विदेश मंत्रालय के समन्वय से हुई इस कार्रवाई को भारत की आर्थिक अपराधियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' नीति की एक बड़ी जीत माना जा रहा है।
कमलेश पारेख पर आरोप है कि उन्होंने अपने भाई नीलेश पारेख और उमेश पारेख के साथ मिलकर 25 बैंकों के एक बड़े कंसोर्टियम (समूह) के साथ 2,672 करोड़ रुपये की भारी-भरकम धोखाधड़ी की।सीबीआई की जांच रिपोर्ट के अनुसार, कमलेश पारेख ने इस घोटाले को बहुत ही शातिर तरीके से अंजाम दिया था। साल 2013-14 के दौरान, गणेश ज्वेलरी हाउस लिमिटेड ने कच्चे सोने के आयात और आभूषणों के निर्यात के नाम पर बैंकों से बड़े पैमाने पर कर्ज लिया था। इस कंसोर्टियम का नेतृत्व भारतीय स्टेट बैंक रहा था।
जांच में खुलासा हुआ कि, पारेख बंधुओं ने बैंक से लिए गए फंड का इस्तेमाल व्यापार में करने के बजाय, उसे शेल कंपनियों और विदेशी संस्थाओं में डाइवर्ट कर दिया। उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात , सिंगापुर और हांगकांग में कई ऐसी फर्में बनाईं, जिनका असल में कोई व्यापार नहीं था। इन फर्मों को आभूषण निर्यात के फर्जी बिल दिखाए गए और बैंक से मिली राशि को 'मनी लॉन्ड्रिंग' के जरिए निजी संपत्तियों में बदल दिया गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीबीआई की घेराबंदी
कमलेश पारेख साल 2016 से ही जांच एजेंसियों की रडार पर थे। जब सीबीआई ने उनके खिलाफ मामले की गंभीरता को देखते हुए शिकंजा कसना शुरू किया, तो वे देश छोड़कर फरार हो गए। सीबीआई ने इस मामले में कोलकाता की विशेष अदालत से गैर-जमानती वारंट हासिल किया और इंटरपोल के माध्यम से पारेख के खिलाफ 'रेड नोटिस' जारी करवाया।लंबे समय तक दुबई और अन्य खाड़ी देशों में छिपे रहने के बाद, इंटरपोल की रियल-टाइम सूचना साझा करने की प्रणाली ने सीबीआई को पारेख की सटीक लोकेशन ट्रैक करने में मदद की। यूएई प्रशासन के साथ महीनों चली कानूनी और कूटनीतिक बातचीत के बाद पारेख को हिरासत में लिया गया और आखिरकार 1 मई को एक विशेष सुरक्षा टीम उसे लेकर दिल्ली के आईजीआई एयरपोर्ट पहुंची।
इस घोटाले की सबसे बड़ी मार देश के बैंकिंग क्षेत्र पर पड़ी। भारतीय स्टेट बैंक के अलावा यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा और पंजाब नेशनल बैंक जैसे बड़े संस्थानों का पैसा इस धोखाधड़ी में डूबा था।आरोपी ने बैंक से प्राप्त लोन का उपयोग करके हांगकांग और यूएई में फर्जी सहायक कंपनियां खड़ी कीं।जांच में पाया गया कि, आरोपियों ने फर्जी एक्सपोर्ट दिखाकर क्रेडिट लिमिट बढ़वाई और उस राशि को निजी विलासिता और विदेशी निवेश में खर्च किया।2014 के बाद जब कंपनी ने किश्तें चुकाना बंद कर दिया, तो बैंकों ने इसे एनपीए (गैर-निष्पादित संपत्ति) घोषित कर दिया, जिससे बैंकिंग प्रणाली पर भारी बोझ पड़ा।
सीबीआई की अगली कार्रवाई ट्रांजिट रिमांड और पूछताछ
दिल्ली पहुंचने के तुरंत बाद, सीबीआई की बैंक प्रतिभूति और धोखाधड़ी शाखा, कोलकाता ने कमलेश पारेख को औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया। अधिकारियों का कहना है कि कमलेश से पूछताछ में उन कई 'गुप्त संपत्तियों' का खुलासा हो सकता है जो उसने बैंक के पैसों से विदेश में खरीदी हैं।सीबीआई उसे दिल्ली की अदालत में पेश कर ट्रांजिट रिमांड की मांग करेगी, ताकि उसे मुख्य सुनवाई के लिए कोलकाता ले जाया जा सके। कोलकाता की सीबीआई अदालत में पहले से ही इस घोटाले से जुड़े अन्य आरोपियों के खिलाफ सुनवाई चल रही है।
कमलेश पारेख का प्रत्यर्पण भारत सरकार की उन कोशिशों का हिस्सा है जिसके तहत विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे बड़े आर्थिक अपराधियों को वापस लाने की प्रक्रिया चल रही है। पारेख की गिरफ्तारी से उन अपराधियों को स्पष्ट संदेश गया है जो देश का पैसा लेकर विदेशों में शरण लेने की फिराक में रहते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में पारेख से होने वाली पूछताछ से बैंकिंग घोटाले की कई अन्य परतों से पर्दा उठेगा और बैंकों के करोड़ों रुपये की वसूली की राह आसान होगी।

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मुस्कान सिंह
रिपोर्टर