बीकेटी के खंतारी गांव में बिना परमिट काट डाले 12 हरे पेड़, ग्रामीणों में भारी आक्रोश
बख्शी का तालाब थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले खंतारी गांव में लकड़ी तस्करों के एक संगठित गिरोह ने प्रशासनिक मुस्तैदी को खुली चुनौती देते हुए एक ही दिन में 12 फलदार और औषधीय पेड़ों को जमींदोज कर दिया।इस सामूहिक वृक्ष संहार के बाद से पूरे इलाके के ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है। पर्यावरण को हुए इस अपूरणीय नुकसान को लेकर स्थानीय निवासियों ने वन विभाग और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर
lucknow
7:52 PM, May 19, 2026
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खंतारी गांव में बिना परमिट काट डाले 12 हरे पेड़ संकेतिक फोटो सौ0 bma7.in
लखनऊ। बख्शी का तालाब थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले खंतारी गांव में लकड़ी तस्करों के एक संगठित गिरोह ने प्रशासनिक मुस्तैदी को खुली चुनौती देते हुए एक ही दिन में 12 फलदार और औषधीय पेड़ों को जमींदोज कर दिया।इस सामूहिक वृक्ष संहार के बाद से पूरे इलाके के ग्रामीणों में भारी आक्रोश व्याप्त है। पर्यावरण को हुए इस अपूरणीय नुकसान को लेकर स्थानीय निवासियों ने वन विभाग और पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक, इस पूरे अवैध कटान के पीछे क्षेत्र का एक कुख्यात और सक्रिय लकड़ी तस्कर मुख्य सूत्रधार बताया जा रहा है, जिसकी पहचान इसरार के रूप में हुई है। पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर किए गए इस खेल में तस्करों ने बेहद शातिर दिमाग का इस्तेमाल किया। वन विभाग की प्रवर्तन टीमों और स्थानीय पुलिस की संभावित छापेमारी से बचने के लिए गिरोह ने जानबूझकर रविवार (छुट्टी के दिन) का चयन किया।तस्करों को बखूबी मालूम था कि, रविवार को सरकारी दफ्तरों में अवकाश होने के कारण अधिकारियों और फील्ड स्टाफ की निगरानी ढीली रहती है। इसी का फायदा उठाकर तस्कर सुबह तड़के ही दर्जनों मजदूरों और अत्याधुनिक कटर मशीनों के साथ खंतारी गांव के बीचों-बीच स्थित एक परिसर में दाखिल हो गए। बिना किसी डर या कानूनी खौफ के, एक के बाद एक कुल 12 हरे-भरे पेड़ों को जड़ से काट दिया गया। दोपहर होते-होते कटी हुई कीमती लकड़ियों को ठिकाने लगाने की तैयारी भी कर ली गई थी।
हैरानी की बात यह है कि, जिन पेड़ों को निशाना बनाया गया, वे कोई साधारण पेड़ नहीं थे। काटे गए वृक्षों में मुख्य रूप से फलदार आम के पेड़ और औषधीय गुणों की खान माने जाने वाले नीम के विशालकाय वृक्ष शामिल थे। ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और पर्यावरण संतुलन में इन दोनों ही प्रजातियों का बहुत बड़ा योगदान होता है।ग्रामीणों का कहना है कि ,ये पेड़ केवल हरियाली का हिस्सा नहीं थे, बल्कि पूरे गांव के लिए प्राकृतिक छांव और शुद्ध हवा का मुख्य स्रोत थे। तपती गर्मी के इस मौसम में इतने बड़े पैमाने पर छायादार और फलदार पेड़ों का काटा जाना सीधे तौर पर प्रकृति के साथ क्रूर मजाक है।
इस पूरे अवैध कारोबार की जो सबसे स्याह और चौंकाने वाली कड़वी सच्चाई सामने आई है, वह है तस्करों का कॉर्पोरेट स्टाइल में काम करने का तरीका। जिस प्रकार एक शातिर कॉर्पोरेट अकाउंटेंट या मुनीम अपने बही-खातों में हेरफेर करके बड़े से बड़े वित्तीय घोटालों को फाइलों में छुपा देता है, ठीक उसी तर्ज पर इस संगठित वन माफिया ने भी काम किया।कानूनी शिकंजे से बचने के लिए इस गिरोह ने कागजी सबूतों को पहले ही पूरी तरह से गायब कर दिया। परिवहन और कटान से जुड़े किसी भी प्रकार के फर्जी या असली दस्तावेज के निशान पीछे नहीं छोड़े गए ताकि पकड़े जाने पर स्वामित्व को लेकर कानूनी उलझन पैदा की जा सके। बिना किसी परमिट, बिना किसी आधिकारिक अनुमति और बिना किसी वैध ट्रांजिट पास के इतने बड़े पैमाने पर सरेआम कटान होना यह साबित करता है कि, स्थानीय स्तर पर तस्करों का नेटवर्क कितना मजबूत और बेखौफ हो चुका है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, 'उत्तर प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम, 1976' के तहत राज्य में किसी भी प्रकार के हरे पेड़ को बिना वन विभाग की पूर्व लिखित अनुमति के काटना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है। विशेष रूप से आम, नीम, महुआ और पीपल जैसी प्रजातियों को लेकर नियम और भी ज्यादा सख्त हैं।यदि कोई पेड़ सूख भी चुका हो, तब भी उसकी कटाई के लिए राजस्व और वन विभाग की संयुक्त टीम की रिपोर्ट के बाद ही परमिट जारी किया जाता है। खंतारी गांव में जिस तरह बिना किसी कागजी प्रक्रिया के 12 हरे पेड़ काट दिए गए, वह सीधे तौर पर इस अधिनियम की धज्जियां उड़ाने जैसा है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि ऐसे शातिर अपराधियों पर तुरंत लगाम नहीं कसी गई, तो क्षेत्र का बचा-कुचा फॉरेस्ट कवर भी चंद दिनों में कंक्रीट के जंगल में बदल जाएगा।
घटना के बाद से ही खंतारी गांव में तनाव और गुस्से का माहौल है। ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मामले की लिखित शिकायत स्थानीय पुलिस प्रशासन और वन विभाग के उच्चाधिकारियों को भेज दी है। ग्रामीणों की स्पष्ट मांग है कि,मुख्य आरोपी लकड़ी तस्कर इजरार और उसके अज्ञात सहयोगियों के खिलाफ वन संरक्षण अधिनियम की सुसंगत धाराओं के तहत तत्काल प्रभाव से एफआईआर दर्ज की जाए।मौके से काटी गई सभी कीमती लकड़ियों और कटान में इस्तेमाल किए गए उपकरणों को वन विभाग तुरंत अपने कब्जे में लेकर सीज करे।इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच हो कि, आखिर इतनी बड़ी घटना के दौरान स्थानीय बीट सिपाही और वन दरोगा को इसकी भनक क्यों नहीं लगी।
स्थानीय निवासियो का कहना है कि,अब देखना यह होगा कि, इस गंभीर मामले पर वन विभाग के आला अधिकारी क्या रुख अपनाते हैं। क्या पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले इन सफेदपोश तस्करों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा या फिर हमेशा की तरह कागजी खानापूर्ति करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? इस घटना ने बख्शी का तालाब क्षेत्र में पर्यावरण सुरक्षा के दावों की कलई खोलकर रख दी है।

लेखक के बारे में
मुस्कान सिंह
रिपोर्टर